मनकी स्वर



धन और जौबन को लेके

कभी किसिपे गुरुर मतकरना यारों

किउंकि ये किसीन किसी दिन

अबश्य खत्म होहि जाता है 

तब प्र्रारंभ होता जिबनकी व क्षन

जहां केवल रहता दुःख चलता दुर्दिन ।


जब ये दुर्दिनकी बतास चलती

तब कंठ एकदम होता क्षीण 

करता अंदर ही अंदर दहन

दुःख बढ़ जाता अप्रमित अकथन

अपनी आप निकलता एक करुण क्रंदन

मगर ये किसीको सुनाई नहीं देता

हरकोई रहते निरब द्रष्टा करते दर्शन

चलजाते अपनी राहोंपे करते काहाँ अनुसोचन ।


इंहा एक मानब खोदेता अपना गुण

मूल्यबोध हरादेता जो मानबताका मान

कुछी लोगोंको केवल सुनाई देता ये आबेदन

जिनमें होता मानव की प्रति अपनापन ।


व जताता अपना कर्तब दिखाता सहानुभूति

ऐसे एक स्थिति में कुछ भी रहते काल बन 

उनको व मनकी स्वर सुनाई नहीं देता

वे रहते अथर्व बनते पासण देते नहीं ध्यान ।



टिप्पणियाँ